Tuesday, 11 June 2013

भगवतगीतेवर बौध्द धर्माचा प्रभाव


हिंदू धर्मीय भगवतगीता या ग्रंथास पवित्र ग्रंथ मानतात. सामान्य जनासोबतच भारतीय संतावरसुध्दा  गीतेचा प्रभाव आढळतो. परंतु भारतातील अनेक विद्वान भगवतगीतेचा कार्यकाळ ठरविण्यासाठी टाळाटाळ करीत असतात. भगवतगीतेवर बौध्द धर्माचा प्रभाव असण्याला काही भारतीय विद्वान नकार देतात किंवा चर्चा करण्यास टाळतात. याचा अर्थ गीता ही बुध्दोत्तर काळाच्याही खूप

Monday, 29 April 2013

बुध्द का धर्म




बुध्द ने ऐसे धर्म को जन्म दिया, जिसमे इश्वर की कोई जगह नहीं है। जिसमे परमात्मा को कोई स्थान नहीं है। बुध्द ने संदेह से शुरू की यात्रा और शून्य पर पूर्ण की। संदेह और शून्य के बिच में बुध्द का सारा बोध है। संदेह को धर्म का आधार बनाया और शून्य को धर्म की उपलब्धि। बाकी सब धर्म विश्वास को आधार बनाते है और पूर्ण को उपलब्धि। बुध्द धर्म को समझने के लिए जिज्ञासा चाहिए। बुद्ध कहते है, माननेसे नहीं चलेगा। गहरी खोज करनी पड़ेगी। दूसरे धर्म कहते है की, पहला कदम बस तुम्हारे भरोसे की बात है, उठा लो, इससे ज्यादा आपको कुछ करने की जरुरत नहीं है। लेकिन बुध्द का धर्म तो तुमसे पहले कदम पर पहुचने के लिए भी बड़ी लंबी यात्रा की मांग करता है। वह कहता है, संदेह की प्रगाढ़ अग्नि में जलना होगा, क्योकि तुम जो भरोसा करोगे. वह तुम्हारे बुध्दी पर का भरोसा होगा।  अगर बुध्दी  में ही रोग है तो उस रोग से जन्मा हुवा विश्वास भी बिमाहोगा।  
मंदिर अंधेरेमे ही नहीं पड़े है वे अँधेरे की सुरक्षा स्थल है। आस्था के नाम सब तरह के पाप वहां चलते है। विश्वास के नीछे सब तरह का झूठ चलता है।  धर्म पाखण्ड है क्योकि शुरुवात में ही चूक हो जाती है।  क्योकि पहले कदम पर ही तुम कमजोर पड जाते हो। तुम्हारा विश्वास तुम्हे पार न ले जा सकेगा. इसीलिए बुध्द ने कहा तोडो विश्वास, छोडो विश्वास.सब धारणाए गिरा देनी है। संदेह की अग्नि में उतरना है। दुस्साहसी चाहिए, खोजी चाहिए, अन्वेषक चाहिए, चुनौती स्वीकार करने का साहस निर्माण होना चाहिए.
बुध्द कहते है, आश्वासन कोई भी नहीं है क्योकि कोण तुम्हे आश्वासन देगा?। यहाँ कोई भी नहीं है जो तुम्हारा हाथ पकडे। अकेले ही जाना है मरते वक्त तक।  बुध्द ने कहा अप्प दीप भव! अपने ही दीए बनो। मै मरा तो रो मत।  मै कोण हू? मै आपको ज्यादा से ज्यादा दिशा दे सकता हू। चलना तुम्हे है।  मै रहू तो भी चलना तुम्हे है, अगर न रहू तो भी चलना तुम्हे है। झुको मत, सहारा लेना मत, क्योकि सब सहारे अंत:ता लंगड़ा बना देते है। सब सहारे तुम्हे अंधा बना देते है। सहारे धीर धीरे तुम्हे कमजोर कर देते है। बैसाखिया धीर धीरे तुम्हारे पैरों की परिपूर्ति कर देती है।  फिर तुम पैरों की फ़िक्र ही छोड़ देते हो।
बुध्द कहते है, संदेह करो, बुध्द का धर्म वैज्ञानिक है। संदेह विज्ञान प्राथमिक चरण है। इसीलिए भविष्य में जैसे जैसे लोकमानस वैज्ञानिक होता जाएगा, वैसे वैसे समय बुध्द के अनुकूल होता जाएगा।  जैसे जैसे लोग सोचने और विचारने की गहनता में उतरेंगे और उधार और बासे विश्वास न करेंगे, हर किसी बात को मान लेने को राजी न होंगे, बगावत बढ़ेगी, लोग हिम्मती होंगे, विद्रोही होंगे, वैसे वैसे बुध्द की बात लोगो के करीब आने लगेगी।
जगत में बुध्द का आदर बढ़ रहा है।  जो भी विचारक है, चिन्तक है, वैज्ञानिक है, उनके मन में बुध्द का आदर रोज बढ़ रहा है। बुध्द बिना लड़े जित रहे है।  क्योकि बुध्द कहते है, हम तुमसे मानने को नहीं कहते, खोजने को कहते है। जब खोज लोंगे तो मानेंगे, बिना खोजे कैसे मान लोंगे. यह विज्ञान का सूत्र है।  
सत्य इतना सस्ता नहीं है, की वह बिना खोजे मिल जाए। सत्य कोई संपति नहीं है, जैसे पिता की वसीयत मरने के बाद पुत्र को मिल जाती है।  बुद्ध कहते है, सत्य को खोजना पड़ेगा. भ्रम जाल तथा माया को भुलाकर उसे ढूंढना होगा और तुम्हारे भीतर भी कमजोरिया बहुत है। थक जाते तो कही भी भरोसा करके रुक सकते हो, किसी भी मंदिर के सामने, थके हारे सर झुका सकते हो, इसीलिए नहीं की तुम्हे कोई  जगह मिल गयी, जहा सर झुकाने का मुकाम आ गया था, बस सिर्फ  इसीलिए की अब तुम थक गए, अब और नहीं खोजा जाता. बुध्द तुम्हे कोई जगह नहीं देते, तुम्हारे कमजोरी के लिए वह कोई जगा नहीं होती।  बुध्द कहते है, ज्ञान तो मिलाता है, आत्म परिष्कार से, शास्त्र से नहीं, सत्य कोई धारना नहीं है। सत्य कोई सिध्दांत नहीं है। सत्य तो जीवन का निखार है। सत्य तो ऐसा है, जैसे सोने को कोई आग में डालता है तो निखरता है, जलाता है, पिघलता है, तड़पाता है।  व्यर्थ जल जाता है, सार्थक बचाता है।  सत्य तो तुममे है, कूड़े करकट में दबा है और जबतक तुम आग से न गुजरो, तुम उस सत्य को कैसे खोज पाओगे.?
बुध्द कहते है, जल्दी मत करना भरोसे करने की, भरोसा तभी करना जब संदेह करने की जगह ही न रह जाए, लेकिन दूसरे धर्म संदेह के विपरीत केवल भरोसा करनेकी सलाह देते है।  संदेह के विपरीत श्रध्दा करनेकी सलाह देते है।  लेकिन बुध्द संदेह करने की पूरी छूट देते है। इतना संदेह करो की, आखिर में तुम्हारा संदेह नष्ट हो जाए और केवल परिणाम बच जाए, जिसे तुम ढूढ रहे हो।  बुध्द कहते है, दबे हुए सड़े को बाहर निकालो, उससे छुटकारा पाने का एक ही उपाय है, उसे रोशनी में लाओ।  
बुध्द ने संदेह को जन्म दिया है। बुध्द का युग कभी भी बुद्धिवादी नहीं था।  केवल बुध्द ही बुध्दिवादी थे।  उन्होंने लंबे और कठिन मार्ग से यात्रा की थी। शार्टकट मार्ग की कोइ गुंजाइश नहीं थी।  तुम जिसे श्रध्दा मानते हो, वह शार्टकट का रास्ता है। तुम बिना गए, बिना कही पहुचे, बिना कुछ किये श्रध्दा कर लेते हो।  ऐसी श्रध्दा नपुसकता  के सिवा कुछ नहीं है। तुम्हारे शास्त्र लिखते है, नास्तिकोकी बाते मत सुनना, नास्तिक कुछ कहे तो कान में उंगलिया डाल देना।  यह तो भयभितता है।  डरपोकता के सिवा कुछ नहीं है। ऐसे धर्म के शास्त्र कमजोरी सिखाते है, जो आस्था इतनी डरपोक है की नास्तिक की बात सुनाने से कापती हो।  इससे तो नास्तिक बेहतर है, कम से कम उनके शास्त्र में कही नहीं लिखा की आस्तिक की बात सुनने ने से डरना है। नास्तिक कभी डरता नहीं है, लेकिन आस्तिक हमेशा डरते है।
बुध्द ने संदेह को जन्म दिया है, संदेह करते करते तूम संदेह से मुक्ति पा लेते हो।  जहा संदेह खत्म होता है वहा सूरज उगता है। परमात्मा असहाय अवस्था की पुकार होती है। जिसको तुमने झुकना समझा है, वह कही तुम्हारे कांपते और भयभीत पैरों की कमजोरी तो नहीं है। जिसको तुमने समर्पण समझा है, वह तुम्हारी कायरता तो नहीं?.
बुध्द ने तुमसे परमात्मा नहीं छिना, उन्होंने तुमसे तुम्हारी बेचारगी छिनी है। बुध्द ने तुमसे मंदिर नहीं छीने, तुम्हारे कमजोरी के शरणस्थल छीने है। बुध्द ने कहा, तुम्हे खुद ही चलना है, बुध्द ने तुम्हारे पैरों को सदियों सदियों के बाद फिर से खून दिया है। तुम्हे अपने पैरों पर खड़े होने की हिम्मत दी है।  बुध्द उसी को सदधर्म कहते है, जो तुम्हे तुम्हारे भीतर छिपे हुए सत्य से परिचित कराए। झूठी आस्थाओ में नहीं, धारानाओ में नहीं, शास्त्रों में नहीं, व्यर्थ के शब्दजालो में नहीं।
बुध्द ने आत्मा के स्वरूप को शून्य कहा है। उन्होंने आत्मा शब्द में खतरा देखा. क्योकि उन्हें लगा तुम किसी चीज के तलाश में हो, जो भीतर रखी है। जब तुम कहते हो तुम्हारे भीतर आत्मा है, जैसे की तुम्हारे घर में कुर्सी रखी हो, तुम्हारे भीतर आत्मा रखी है, आत्मा कोई वस्तु है की गए भीतर और पा गए। बुध्द ने आत्मा शब्द का शब्दप्रयोग नहीं किया क्योकि आत्मा से जडता का पता लगता है। आत्मा शब्द का मतलब यह हुवा की कुछ तुम्हारे भीतर ठहरा हुवा है, रुका हुवा है, कुछ तुम्हारे भीतर मौजूद है।  तो जो मौजूद ही ही है, वह जड है।  
बुध्द ने कहा था, तुम ही तुम्हारे शास्ता हो, तूम ही तुम्हारे गुरु हो, तुम ही तुम्हारे शास्त्र हो और तुम्हारे चैतन्य के शिवाय और कोई नहीं है। 

Monday, 25 February 2013

Why did Buddhism disappear from South Asia? Brahmin atrocities that destroyed Buddhism in the Subcontinent


Many wonder why Buddhism disappeared from the Subcontinent but thrives in China, Japan, Korea, Thailand, Laos, Cambodia and in Sri Lanka. Many Hindus claim that Buddha was a Hindu God. Of courseBuddhists in China, Thailand and other countries and in India do not accept that doctrine. In fact Buddhism was hounded out of its birthplace.Prince Sidharta’s rejection of the hand of the illegitimate daughter had angered Vidudabha, son of Prasenadi, king of Koshala ostensibly because of their caste pride. They had withheld their legitimate daughters from the Prince. Hence began the war between Buddha and the Brahmans, and between Buddhism and Brahamanism.

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DISAPPEARANCE OF BUDDHISM FROM INDIA:THE BRAHMIN RESPONSIBILITY


Due to the lack of historical and archeological evidence, there is no absoluteconsensus till date on what led to the disappearance of Buddhism from India.However, if we analyze all the contributing factors and arrange them in achronological order, we would realize that the whole sequence of events wasinitiated by the Buddhist monks when they had abandoned the community visitsand concentrated on their own salvation instead of helping the common peopleand oppressed classes to end their sufferings. As the lay devotees were ignored,Buddhism started losing the general support from the community. Subsequently,the Brahmins took advantage of this situation and deepened the rift between thecommon people and the Buddhist practitioners. They also manipulated thecontemporary rulers to withdraw their support from Buddhism and help inreviving the existing Brahmanism. This was followed by the revival of Hinduismand further decline of Buddhism 



How Adi Shankara destroyed Buddhism and founded ‘Hinduism’ in the 8th century


Why did Buddhism disappear from Bharat?
Jainism was in full swing in India prior to Hinduism. All royal people were influenced by Jain monks and there speech on ruthless Hindu Kshatriya or warrior dharma/religion of protection & offense. They highlighted the path of peace and salvation that could only be attained by Jainism.
The Brahmins performed a great Puja and earnestly prayed Lord Shiva to stop the progress of Jainism. According to aggressive Hindu beliefs Adi Shankaracharya was born. Regarding Shankaracharya it is said in at least one case he was not able to answer questions placed by a married woman regarding sex and he was not aware of sexual behaviors because being a Brahmin he was performing vrat of Brahmcharya where a person is supposed to fight back any sexual thoughts arising in mind. Hence his knowledge regarding sex was either zero or in infancy or very less as compared to sex indulged people of his age. http://rupeenews.com/2010/10/how-adi-shankara-destroyed-buddhism-and-founded-hinduism-in-the-8th-century/

Friday, 9 November 2012

Was Jesus a Buddhist?

Was Jesus a Buddhist? Certainly he was many things--Jew, prophet, healer, moralist, revolutionary, by his own admission the Messiah, and for most Christians the Son of God and redeemer of their sins. And there is convincing evidence that he was also a Buddhist. The evidence follows two independent lines--the first is historical, and the second is textual. Historical evidence indicates that Jesus was well acquainted with Buddhism. If Jesus did not go to India, then at least India went to Judea and Jesus. The real historical question is not if he studied Buddhism, but where and how much he studied Buddhism, especially during his so-called "lost years."

Historical accounts aside, many textual analyses indicate striking similarities between what was said by Jesus and by Buddha and between the prophetic legend of Jesus and ancient Buddhist texts. The conclusion is that, although not identifying himself as a Buddhist for good reasons, Jesus spoke like a Buddhist. The similarities are so striking that, even if no historical evidence existed, we can suspect that Jesus studied Buddhist teachings and that the prophecy and legend of Jesus was derived from Buddhist stories.

सुखी माणसाचा सदरा घातलेला भिक्‍खू

जगी सर्व सुखी असा कोण आहे, हा प्रश्‍न नेहमीच आपण स्वतःला करीत असतो. शास्त्रज्ञांना मात्र याचे उत्तर सापडले असून, काठमांडूतील एका बौद्ध भिक्‍खूला जगातील सर्वांत आनंदी माणसाचा किताब देण्यात आला आहे. मॅथ्यू रिकार्ड असे त्यांचे नाव. रिकार्ड हे स्वतः ही एक शास्त्रज्ञ आहेत. तिबेटचे धर्मगुरू दलाई लामा यांच्याबरोबर संवादक म्हणून ते जगभर भ्रमण करीत असतात. 

रिकार्ड हे फ्रान्सचे नागरिक असून, मॉल्युक्‍यूलर जेनेटिस्ट आहेत. विस्कॉन्सिन विद्यापीठात मेंदूतज्ज्ञ रिचर्ड डेव्हिडसन यांनी ध्यानधारणा करणाऱ्या अनेकांच्या मेंदूची शास्त्रीय चाचणी घेतली. रिकार्ड यांच्या मेंदूला 256 सेन्सर्स लावून केलेल्या चाचणीत त्यांच्या मेंदूतून गॅमा लहरी मोठ्या प्रमाणात बाहेर पडत असल्याचे निष्पन्न झाले. या लहरींचा संबंध माणसाच्या जागृतावस्था, अध्ययन, स्मृती आणि लक्ष देण्याच्या क्रियेशी आहे. एवढ्या प्रमाणात गॅमा लहरी बाहेर पडत असल्याचे याआधी कधीही नोंदविण्यात आलेले नाही. या चाचणीत रिकॉर्ड यांच्या मेंदूचा डावा भाग हा उजव्या भागाच्या तुलनेत जास्त क्रियाशील असल्याचे दिसले. 

पाश्‍चात्य जगात रिकार्ड यांची ओळख "बौद्ध धर्माचा चेहरा' अशी आहे. रिकार्ड यांचा जन्म पॅरिसमध्ये झाला. त्यांचे वडील ज्यॉं फ्रान्सिस रिवेल हे तत्त्वज्ञ, तर आई यान ली टॉमेलिन या चित्रकार. यामुळे पॅरिसमधील बौद्धिक वर्तुळात ते लहानपणापासून रमले. अनेक चित्रकार, साहित्यिक, संगीतकार यांचा त्यांच्या घरी राबता असे. पॅरिसमधील पाश्‍चर इन्स्टिट्यूटमधून 1972 मध्ये "सेल जेनेटिक्‍स' या विषयात त्यांनी पीएच.डी. मिळविली. शास्त्रीय संशोधनाच्या क्षेत्रात चालणाऱ्या चर्चा आणि वादविवादांमुळे लवकरच त्यांना उबग आला. त्यांनी मग सुटीत बौद्ध धर्म अभ्यासण्यासाठी दार्जिलिंगकडे धाव घेतली. नंतर त्यांनी वडिलांसमवेत "द मॉंक ऍण्ड द फिलॉसॉफर' हे पुस्तक लिहिले. या पुस्तकाने त्यांचे नाव जगभर केले. 

"हॅपीनेस : अ गाईड टू डेव्हलपिंग लाईफ्स मोस्ट इपॉंर्टंट स्किल', "द क्वांटम ऍण्ड द लोट्‌स' आणि "व्हाय मेडिटेट' अशा पुस्तकांतून त्यांनी त्यांचे अनुभव मांडले आहेत. त्यांची पुस्तके वीसहून अधिक भाषांत अनुवादित झालेली आहेत. याचबरोबर ते उत्तम छायाचित्रकार आहेत. शास्त्रज्ञ व बौद्ध विद्वान यांच्या समन्वयातून चालणाऱ्या माईंड ऍण्ड लाइफ इन्स्टिट्यूटचे ते सदस्य आहेत. त्यांनी केलेल्या कार्याबद्दल फ्रान्स सरकारने त्यांना "ऑर्डर ऑफ मेरिट' पुरस्कार देऊन गौरविले आहे. ( सकाळ.)